आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

साजन की आश

                
                                                         
                            बिन बदरा बरसे
                                                                 
                            
ये जाय ना कहीं
मोहे चित्त लागे
कि साजन मेरो आवत है कहीं
ये व्याकुल मन तरसे रे
ये यहाँ वहाँ भटके रे
कारी नैना,रस्ता देखें,
करे जिद मेरो लड़ जाऊँ मैं बदरा से
कभी हम मिले न नजर भी न आए
तू इतना न कर प्यार जुदा हो न जाए
-मनोज कुमार यकता
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर