बिन बदरा बरसे
ये जाय ना कहीं
मोहे चित्त लागे
कि साजन मेरो आवत है कहीं
ये व्याकुल मन तरसे रे
ये यहाँ वहाँ भटके रे
कारी नैना,रस्ता देखें,
करे जिद मेरो लड़ जाऊँ मैं बदरा से
कभी हम मिले न नजर भी न आए
तू इतना न कर प्यार जुदा हो न जाए
-मनोज कुमार यकता
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X