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तेरी नज़र है जो

                
                                                         
                            तेरी नज़र है,जो हमको सताए बैठा है !
                                                                 
                            
जाने क्या कहर है,जो हमपे ढाए बैठा है!

नहीं रूकती है आरजू जो मेरे दिल में बसी है,
जाने क्या डगर वो ,हमको चलाए बैठा है!

जहां से हारके दिल जीने की इक जिद पे अड़ा है,
जाने क्या जहर वो हमको पिलाए बैठा है!

नहीं निकल सकते हैं अब तो चाह के भी हम
जाने क्या भंवर में हमको फंसाए बैठा है!

भुगत रहा है अपनी इसी वो गुस्ताखी की सजा
हमें इस कदर वो खुद में सजाए बैठा है!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
40 मिनट पहले

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