बहती एक नदी हूं मैं,
अपने में समाएं एक दुनिया हूं,
चलती हूं आसमां के तले,
संग काफिला कितना लिए,
कल कल की आवाज हूं मैं,
सब के कल की जरूरत हूं।
बहती एक नदी हूं मैं।।
चीर दिए पर्वत ऊंचे, वो हूं मैं,
सदियों जितनी दूरी तय करती हूं।
कई तूफान झेले है मैने,
हर मौसम में ढल गई,
सबकी जीवनदायिनी मां हूं मैं।
बहती एक नदी हूं मैं।।
एक सदी से, क्या हो गई हूं मैं,
चलती सांसों पर पहरा लिए हूं,
लम्बे रास्ते नहीं अब मेरे,
थोड़ा पानी है, या आंसू मेरे,
भीतर से कुछ शेष नहीं हु मैं,
अब ठहरी हुई एक नदी हूं।।
चट्टानें न रोक सकी, वो थी मैं,
चंद कंक्रीट के ढेलों से रुकी हूं।
समा दिया पानी धरातल में,
उम्मीद में कोई ढूंढेगा निशान मेरे,
घुटती सांसों संग भी जिंदा हूं मैं,
ठहरी नदी या एक औरत हूं मैं।।
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