आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ठहरी हुई नदी

                
                                                         
                            बहती एक नदी हूं मैं,
                                                                 
                            
अपने में समाएं एक दुनिया हूं,
चलती हूं आसमां के तले,
संग काफिला कितना लिए,
कल कल की आवाज हूं मैं,
सब के कल की जरूरत हूं।
बहती एक नदी हूं मैं।।

चीर दिए पर्वत ऊंचे, वो हूं मैं,
सदियों जितनी दूरी तय करती हूं।
कई तूफान झेले है मैने,
हर मौसम में ढल गई,
सबकी जीवनदायिनी मां हूं मैं।
बहती एक नदी हूं मैं।।

एक सदी से, क्या हो गई हूं मैं,
चलती सांसों पर पहरा लिए हूं,
लम्बे रास्ते नहीं अब मेरे,
थोड़ा पानी है, या आंसू मेरे,
भीतर से कुछ शेष नहीं हु मैं,
अब ठहरी हुई एक नदी  हूं।।

चट्टानें न रोक सकी, वो थी मैं,
चंद कंक्रीट के ढेलों से रुकी हूं।
समा दिया पानी धरातल में,
उम्मीद में कोई ढूंढेगा निशान मेरे,
घुटती सांसों संग भी जिंदा हूं मैं,
ठहरी नदी या एक औरत हूं मैं।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर