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चारों ओर विध्वंस मचा

                
                                                         
                            यह एक क्रम है काल का उत्सर्पणी अवसर्पणी का चक्र
                                                                 
                            
जो ऊपर तक पहुँचा वो नीचे उतरेगा तभी तो पुनः चढ़ेगा
सुखम सुखम से दुखम दुखम तक पहुंचना नियति है
चारों तरह हो रहा विध्वंस शायद इसी का प्रतीक है!

जब आसमान चीर लिया, चाँद सितारे भेद लिए
नक्षत्र ग्रहों को कुरेद लिया , सूरज को गिरवी रख लिया
इंसान अपनी बुद्धि का नैतिकता से नाता भूल गया
तभी तो दिव्य खेल होगा उस अपरिमित प्रकृति का!

अपने ही जाल में बाँधा जाएगा मानवता का पागलपन
अपने ही हाथों से रौदेंगा बना बनाया ये संसार
उगलेंगे आग पंचतत्व मिटाने उसका ही अस्तित्व
हारेगा उसका दंभ होगा, स्वयं सब कुछ करेगा नाश

एक आरा ख़त्म होगा तभी तो आयेगा नया काल चक्र
सत्य युग कहो या कहो कृत युग से होगा आग़ाज़
जहाँ होगा सरल और मृदु मानव का भव और साज
त्रेता द्वापर से पहुँचेगा फिर से कलयुग तक काल क्रम

सहना होगा इसलिए हमे ये हाहाकार और चीत्कार
संयम से ही हो सकेगी जलते सागर नैया पार
कर लो धर्म कर्म और जीतो इन्द्रियों का जंजाल
होगा ये भी अंत , बस करो सब्र से दरिया पार
-मीनू लोढ़ा
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एक घंटा पहले

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