आज जो खास थे वो आए ही नहीं
बस इत्यादि से ही सभा भरी रही
अब समझ नहीं आया क्या करना है
ऊपर मंच की जगह ख़ाली रही
और नीचे इत्यादि इकठ्ठी होती रही
इत्यादि तो आसानी से मिल जाते हैं
ये ख़ास ही बस ज़्यादा भाव खाते हैं
अब सभा तो भरी और सजी हुई थी
मगर कोई रंग जमाने वाला ना मिला
क्यूंकि कोई ख़ास आनेवाला ना मिला
क्या करे इत्यादि तो केवल भीड़ है
उनसे कहाँ कुछ ख़ास हो सकता है
उनको तो बस लिस्ट में जोड़ते रहो
क्यूँकि काउंटिंग का बोझ वही सहता है
नाम तो जो ख़ास है उसी का होता है
अब इस इत्यादि और ख़ास की जोड़ी में
बस एक बात यदा कदा होती रहती है
समय का पहिया घूमता कब किस ओर
और किस्मत इन दोनों की बदलती डोर
कब पलटी मार पहुंचती कोई दूसरी छोर
जिस दिन इत्यादि अहमियत समझ जाएगा
फिर वो इस भीड़ का हिस्सा न बन पायेगा
दिशा बदलने वाला वो भी शायद एक दिन
खास बन मंच पर बैठ जाएगा!
-मीनू लोढ़ा
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