हस्तिनापुर की देहरी पर जब अधर्म ने पांव पसारे,
मौन ने भी अपराध संग मानो अपने बंधन उतारे।
अहंकार ने सत्ता-लिप्सा संग दुर्बुद्धि का खेल रचाया,
पतन में डूबी राजसभा ने विकृति से नाता निभाया।
नेत्र थे पर दृष्टि न थी, चरित्र पतन की राह पर चला,
देखती रही सभा समूची, जब चीर-अपमान का क्षण ढला।
सिंहासन सत्य से डगमगाया, पांडुपुत्र कुछ कर न पाया,
धर्म खड़ा था प्रश्न बना, उत्तर कोई दे न पाया।
सत्य की पराजय हुई, विवेकहीनता का पलड़ा भारी,
भीष्म-द्रोण की चुप्पी गूंजे, विदुर की वाणी थी लाचारी।
द्रौपदी की चेतावनी से गूंज उठी थी हर एक दिशा,
वहीं लिखी गई रक्ताक्षरों में, महाविनाश की प्रथम कथा।
अधर्म के उस एक क्षण ने युगों का संतुलन डिगाया,
कुरुक्षेत्र की धूल ने फिर हर पाप का मूल्य चुकाया।
जहाँ सभा में न्याय मरा, वहाँ रण में धर्म जागा,
विनाश की अग्नि से ही फिर सत्य ने अपना मार्ग माँगा।
-मीनू लोढ़ा
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