कहकसाने ज़हन में एक ख़ला सी रहती है
ढूंढता हूँ मैं किसको क्या कमी सी रहती है।
हम तुम्हारी नज़रों में दोस्त भी नहीं लेकिन
और तुम्हीं को हमसे ही दुश्मनी सी रहती है।
फूंक कर दिये को तुम लुत्फ़ ले रहे हो ना
और तुम्हारे आँगन भी एक चाँदनी सी रहती है।
मेरी नादानियों से मुझ पे क्या गुज़रती है
दिल तो दिल है, आँखों में अब नमी सी रहती है।
रब ने हमारे ख़ून को इक मज़ा सा बख़्शा है
सबको हमारे ख़ून की ख़ूँ तलबी सी रहती है।
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