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पल भर न मिला जो उम्र भर चाहिए़

                
                                                         
                            उलझनों में रहकर सुकून का घर चाहिए़।
                                                                 
                            
पल भर न मिला जो उम्र भर चाहिए़!

दो कदम चलने में बेहाल हो गए.. और
दूर आसमां में उड़ने का पर चाहिए़।
- मोहन त्रिपाठी
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