मैं धरती पे आऊँ दोबारा तो शिवाजी बन के आऊँ
मैं धरती पे आऊँ दोबारा, तो शिवाजी बन के आऊँ,
माँ भवानी का आशीष लेकर, स्वराज्य का दीप जलाऊँ।
माथे पर हो तेज़ धर्म का, हृदय करुणा से भर जाऊँ,
जन-जन की रक्षा की खातिर, अपना जीवन अर्पण कर जाऊँ।
जब अन्याय अंधेरा बनकर, धरती पर छा जाएगा,
तब साहस की ज्वाला लेकर, हर भय को मैं हराऊँगा।
मुग़लों की उस सत्ता के आगे, जिसने अत्याचार बढ़ाया,
स्वाभिमान की ढाल उठाकर, स्वतंत्रता का गीत सुनाऊँ।
नारी का सम्मान बचाऊँ, संतों का रखूँ मान,
गौ, गिरी, ग्राम और जननी का, करूँ सदा कल्याण।
तलवार मेरी क्रोध न होगी, न्याय की होगी पहचान,
शत्रु भी जाने—धर्मवीर का, कैसा होता है सम्मान।
किलों से ऊँचा हो विश्वास, सेना से ऊँची शान,
जनता के दिल पर राज करूँ, यही हो मेरी पहचान।
न लोभ मुझे सिंहासन का, न स्वर्ण-महल की चाह,
भारत माता की सेवा ही, हो जीवन की हर राह।
माँ भवानी का जयघोष गूँजे, गूँजे हर मैदान,
शिव-स्वराज्य की अमर कहानी, लिख दे मेरा बलिदान।
यदि फिर जन्म मिले इस धरती पर, बस इतनी अरदास,
शिवाजी की निर्भीक आत्मा दे, माँ भवानी का विश्वास।
मैं धरती पे आऊँ दोबारा, तो शिवाजी बन के आऊँ,
अन्याय मिटाकर, स्वराज्य जगाकर, भारत का मान बढ़ाऊँ।
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