सुख की तलाश में मानव
हरदम है विचलित रहता
कभी संपत्ति में खोजता
कभी सुरा तो कभी अन्य तलाशता
भौतिक संसाधनों को जुटाने में
दिन रात प्रयत्न किया करता
उसकी तलाश रहती ऐसी
ज्यों मृग कस्तूरी की सुगंध से
भ्रमित होकर इधर उधर भटकता
नाभि में है वह नहीं जानता
मानव सुख शान्ति पाने को
जग के सब यत्न करता
यदि अंतर्मन में झाँक लेता
तो निश्चित ही आनंद पा लेता
असली सुख यदि पाना चाहते
संयम संतुलन त्याग में होती
यही जीवन की सच्ची ऊर्जा है
जो अंतर्मन में निहित होती
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