कभी आबाद था बचपन माँ-पापा की मोहब्बत से
लबालब थी तहें माज़ी की खुशियों की ही दौलत से
झरोखों में भी माज़ी के सुहाना लगता है वो वक़्त
हमारी ज़िद भी पूरी होती थी, रहते थे राहत से
उठाते अश्कों को जो पलकों पर अपने कहा हैं वो
ये दिल अब घबरा जाता है ज़माने की ही वहशत से
थी ग़म से ज़िंदगी महफ़ूज़ ममता के ही आँचल में
तरसती ज़ीस्त उनसे मिलने को, उनकी ही चाहत में
ये दिल भी मुतमइन रहता था उनकी प्यारी क़ुर्बत में
मोहब्बत का ही सरमाया था हासिल उनकी सोहबत से
वो ही मासूम बचपन कोई लौटा अब दे 'पारुल' को
जहाँ शहजादी बनकर रहते थे अपनी ही फ़ितरत से
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