दिल में छुपी भाषा तो नज़रों से बयाँ हो जाती है
खामोश लब रहते हैं आँखों की जुबाँ हो जाती है
गुंचा-ए-दिल खिल उठता है महबूब जो हो सामने
ऐ दिल मोहब्बत तब नई इक दास्ताँ हो जाती है
चैन-ओ-सुकूँ सा मिलता है महबूब की इक दीद से
क़ुर्बत में उसकी धूप भी ग़म की, निहाँ हो जाती है
दिल के इशारे जो तेरी आँखें समझने लग गईं
इश्क-ओ-वफ़ा की कितनी बातें दरमियाँ हो जाती है
'पारुल' समझ जाए कोई तेरी निगाहों की ज़ुबान
तो जीत क्या हर हार भी जफ़र-ए-निशाँ हो जाती है
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