आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नज़रों से बयाँ

                
                                                         
                            दिल में छुपी भाषा तो नज़रों से बयाँ हो जाती है
                                                                 
                            
खामोश लब रहते हैं आँखों  की जुबाँ हो जाती है

गुंचा-ए-दिल खिल उठता है महबूब जो हो सामने
ऐ दिल मोहब्बत तब नई इक दास्ताँ हो जाती है

चैन-ओ-सुकूँ सा मिलता है महबूब की इक दीद से
क़ुर्बत में उसकी धूप भी ग़म की, निहाँ हो जाती है

दिल के इशारे जो तेरी आँखें समझने लग गईं
इश्क-ओ-वफ़ा की कितनी बातें दरमियाँ हो जाती है

'पारुल' समझ जाए कोई तेरी निगाहों की ज़ुबान
तो जीत क्या हर हार भी जफ़र-ए-निशाँ हो जाती है
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
18 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर