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बीते पहाड़ों में जीवन के पल-छिन

                
                                                         
                            पहाड़ों की
                                                                 
                            
नरम ठंडी हवा
भरती मन-प्राण में ठंडक ऐसी
और देती ताज़गी
दिमाग को इतनी
लगता है जैसे
कर रखा हो प्रकृति ने
चालू
अपना एसी वहां
सचमुच करती है काम
प्रकृति
मरहम का भी
लगता है छूटने
मन के भीतर पसरा पड़ा
अवसाद पूरा
जाता निकल वह बाहर
सारा का सारा
आसमान में
रुई के फाहों की तरह
यहां से वहां डोलते
झक सफ़ेद बादल
जाने कब पिघल कर
जाएं बदल पानी में
और फिर कर दें शुरू
धोना
वादियों को
देखने में लगता है
बड़ा अद्भुत दृश्य
वह
वैसे कौन स दृश्य
पहाड़ों का
लगता है अधिक लुभावना
वहां की हरियाली
वहां के पहाड़
या वहां के आसमान का
पल-पल बदलता
रंग और रूप
यह कहने है बड़ा कठिन
पर करता है मन
कि बीतें पहाड़ों में ही
जीवन के पल-छिन।
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एक घंटा पहले

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