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अक़ील नोमानी: तिरा ध्यान आता रहा देर तक

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तिरा ध्यान आता रहा देर तक
मैं ख़ुद को भी अच्छा लगा देर तक

हर इक बात से ला-तअल्लुक़ रहा
सुनी मैं ने अपनी सदा देर तक

मुसाफ़िर तिरा ज़िक्र करते रहे
महकता रहा रास्ता देर तक

वही सारी बातें वही सब ख़याल
चला रात भी सिलसिला देर तक

नवाज़े गए कुछ भले आदमी
सभा में तमाशा हुआ देर तक

तवज्जोह के तालिब थे मंज़र सभी
वहाँ कौन रुकता भला देर तक

 

5 दिन पहले

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