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नौशाद ने जब फेंका एक लाख रुपयों का बंडल

नौशाद
                
                                                         
                            
'नौशाद: जर्रा जो आफताब बना' नामक किताब में चौधरी जिया इमाम ने नौशाद के खुद्दारी जीवन के बारे में कई महीन बातें लिखी हैं। इसी किताब का एक मुख्य संस्मरण जो मुगले-ए-आजम के निर्माण से संबंधित है। 

संस्मरण के अनुसार एक दिन नौशाद साहब अपने घर में एक फिल्म की मौसीकी पर काम कर रहे थे कि उनसे मिलने के.आसिफ़ पहुंचे और कहने लगे कि मैं एक फिल्म बनाने जा रहा हूं और उसमें मौसीक़ी आपको ही देनी है। नौशाद ने तपाक से कहा कि मेरे पास अभी वक़्त नहीं है। मैं बहुत मसरूफ़ हूं और तबियत भी ठीक नहीं है। आप किसी और मौसीक़ार से बात कर लीजिए। आसिफ़ ने जब यह सुना तो तुरंत एक लाख रुपयों का बंडल तपाक से नौशाद के हारमोनियम में रखते हुए बोले, यह एडवांस रख लीजिए मौसीक़ी तो आप ही को देनी है। 

नौशाद ने कहा कि क्या आप समझते हैं कि पैसे के दम पर हर चीज़ ख़रीदी जा सकती है और आप हर चीज़ ख़रीद लेंगे। अपने पैसे उठाइए, मैं फ़िल्म नहीं करुंगा। आसिफ़ ने कहा कैसे नहीं करेंगे, इतने पैसे दूंगा जितने आज तक किसी ने नहीं दिए होंगे। जब आसिफ़ साहब का इसरार और पैसे की बात बढ़ गई तब उन्होंने गुस्से में आकर नोटों का बंडल फेंक दिया। कमरे में नोट ही नोट बिखर गए। उन्होंने नौकर के साथ मिलकर सारे नोट समेटे और पूरा माजरा जाना। आसिफ़ साहब चुटकी बजाते रहे और मुस्कराते रहे फिर नौशाद साहब ने उनसे कहा अच्छा फ़िल्म साथ करेंगे। 

बाद में मोहन स्टूडियो में बैठक हुई तो नौशाद साहब को कहानी सुनाई गई तब उन्होंने कहा कि कहानी तो अच्छी है और अनारकली से बेहतर है। फिल्म मुगल-ए-आजम के निर्माण के दौरान एक-एक डायलाग पर बहस हुआ करती थी। कभी कभी तो माहौल बहुत गर्म हो जाया करता था। एक सीन में जहां अनारकली को चुनवाया जाता है उससे पहले उसकी आख़िर ख़्वाहिश पूछी जाती है। तो वह एक रात की मल्लिका बनने की ख़्वाहिश जाहिर करती है। अकबर यह सुनकर नाराज़ हो जाता है। अकबर की इस नाराज़गी पर अनारकली को क्या जवाब देना है इस डायलाग पर लेखकों के बीच बहुत बहस होती है। 

फिर एक दिन तीनों लेखक अमान साहब, वजाहत मिर्ज़ा और अहसान रिज़वी नौशाद और आसिफ़ के साथ बैठ कर इस पर मंत्रणा करते हैं। एक दिन तीनों लेखक अपने-अपने डायलाग लिखकर लाते हैं और आसिफ़ साहब को सुनाते हैं। आसिफ़ चुपचाच सुनते हैं और वजाहत से पूछते हैं मिर्ज़ा साहब आप क्या लिखकर लाएं हैं। उस वक्त मिर्ज़ा पान खा रहे होते हैं। पीक थूकते हुए कहते हैं कि यह सब बकवास है, इतना बड़ा ड्रामा बोलने की क्या ज़रूरत है। उन्होंने पान की अपनी डिबिया से एक छोटी पर्ची निकाली और कहा अनारकली यहां सिर्फ़ एक जुम्ला अदा करेगी। आसिफ़ ने कहा, पढ़िए क्या कहेगी, मिर्ज़ा साहब बोले पहले अकबर को सलाम करेगी फिर कहेगी यह अदनी कनीज़ जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर को अपना ख़ून माफ़ करती है। इस डायलाग से कमरे में शायराना माहौल बन जाता है। आसिफ़ साहब मिर्जा साहब को तपाक से गले लगा लेते हैं। 

फ़िल्म में जब अनारकली और सलीम आधी रात के वक़्त बाग़ में घूम रहे हैं। इस सीन से पहले कुछ डायलाग लिखे गए थे। लेकिन वह आसिफ़ साहब को पसंद नहीं आए। बाद में उन्होंने फै़सला लिया कि यह सीन ख़ामोश रहेगा और पसमंज़र में तानसेन का गीत होगा, जिसे बाद में नौशाद साहब ने ही लिखा था। फिल्म के महंगे सेट को लेकर भी बहुत कुछ रोचक प्रकरण हैं। महंगे सेट की वजह से आसिफ़ साहब को परेशानी का सामना करना पड़ा। फ़ाइनेंसर शापूर जी का काफ़ी पैसा लग चुका था। फ़िल्म भी बहुत धीरे धीरे पूरी हो रही थी। सबसे महंगा सेट शीश महल का था। 

आसिफ़ साहब को इसमें शूटिंग करने में परेशानी आ रही थी। शीशों में कैमरा भी आ रहा था। शापूर जी पैसा लगाते लगाते परेशान हो रहे थे। एक दिन शापूर जी सोहराब मोदी को लेकर सेट पर पहुंचे और आसिफ़ से कहा कि देख आसिफ़ अब यह फ़िल्म सोहराब मोदी पूरा करेगा तेरा-मेरा कोई वास्ता नहीं। आसिफ़ ने कहा ठीक है सेठ जी जैसी मर्ज़ी लेकिन एक बात कह रहा हूं कि इस सेट को मैं ही पूरा करुंगा अगर कोई दूसरा डायरेक्टर आया तो मैं उसकी टांग तोड़ दूंगा। शापूर बोले आसिफ़ तू दादागिरी करता है। तब आसिफ़ बोले नहीं सेठ जी सारी इंडस्ट्री कह रही है कि इस सेट का फ़िल्मांकन नहीं हो सकता। 

मुझे पागल कहा जा रहा है। मैं हर हाल में इस सेट का फ़िल्मांकन करके दुनिया को बताऊंगा। शापूर ने यह वाक़या नौशाद को बताया, तो वह बोले कोई बात नहीं आसिफ़ को यह सेट पूरा कर लेने दीजिए। सेट की शूटिंग पूरी हुई और जब उसके शॉट धुलने लंदन गए तो वहां से शापूर के पास तार आया कि मुबारक हो शॉट बहुत अच्छे आए हैं। आसिफ़ साहब ने बाद में सेट पूरा किया और शापूर से बोले कि अब बाक़ी की फ़िल्म जिससे चाहो पूरी करा लो, तब शापूर बोले, आसिफ़ क्या बात बोलते हो, अब इस फ़िल्म को तुम्ही मुकम्मल करोगे। 

(नौशाद: ज़र्रा जो अाफताब बना पुस्तक का अंश) लेखक-चौधरी जिया इमाम 
एक वर्ष पहले

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