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द एम्परर ऑफ ऑल मैलडीज: कैंसर की जुबानी, कैंसर की कहानी

The Emperor of All Maladies: A Biography of Cancer book review in hindi
                
                                                         
                            
द एम्परर ऑफ ऑल मैलडीजः ए बायोग्राफी ऑफ कैंसर
लेखक : सिद्धार्थ मुखर्जी
प्रकाशक: स्क्रिबनर
मूल्य ः 2,590 रुपये (हार्डकवर)

कैंसर की जुबानी, कैंसर की कहानी

न्यूयॉर्क टाइम्स की 21वीं सदी की सर्वश्रेष्ठ 100 किताबों में शुमार यह पुलित्जर सम्मानित कृति उन युद्धों के बारे में है, जो मानवता रोज लड़ रही है। कहते हैं कि अगर किसी को जिंदगी में एक ही नॉन फिक्शन पढ़ना हो, तो वह यही है।

सर की अपनी 'जीवनी' के तीन-चौथाई हिस्से तक पहुंचने के बाद, न्यूयॉर्क के ऑन्कोलॉजिस्ट सिद्धार्थ मुखर्जी रुककर अपने लैब का माहौल बताते हैं। एक माइक्रोस्कोप में देखते हुए वह जिस चीज को घूर रहे होते हैं, वह इन्सानी (या कहें कि इन्सान-विरोधी) जीवन के सबसे भयानक रहस्यों में से एक है। जिन ल्यूकेमिया कोशिकाओं की वह जांच कर रहे हैं, वे एक ऐसी महिला के शरीर से ली गई थीं, जिसकी मृत्यु 30 साल पहले हो चुकी है। अपने मृत शरीर के विपरीत, ये कोशिकाएं अमर हैं। इस छोटे-से, लेकिन खास पल में, मुखर्जी न सिर्फ अपनी आंखों देखे दृश्य की बेहद सटीक तस्वीर पेश कर पाते हैं, बल्कि अपने भीतर महसूस हो रही सिहरन को भी बयां कर देते हैं। वैज्ञानिक विशेषज्ञता और कथा-कौशल का मेल अपने आप में काफी दुर्लभ है, लेकिन द एम्परर ऑफ ऑल मैलडीज में मिलने वाली साहित्यिक गूंज यह संकेत देती है कि लेखक का उद्देश्य केवल एक बेहतरीन और सुलभ व्याख्या प्रस्तुत करने से भी कहीं अधिक है। 'सामान्य कोशिकाएं एक समान रूप से सामान्य होती हैं; जबकि घातक कोशिकाएं अलग-अलग और अनोखे तरीकों से घातक बनती हैं।'

इस तरह, जैविक प्रक्रियाओं के उनके अत्यंत सजीव और सटीक विवरण मिलकर एक ऐसे चरित्र का रूप ले लेते हैं, जो पूरी तरह से विकसित है और अजीब-सी जानी-पहचानी लगती है। यह किताब किसी साहित्यिक थ्रिलर की तरह पढ़ी जाती है, जिसमें कैंसर ही मुख्य पात्र है। द एम्परर ऑफ ऑल मैलडीज, उन लोगों को उम्मीद और स्पष्टता देती है, जो कैंसर के रहस्य को समझना चाहते हैं। यह पुस्तक मानवीय सूझ-बूझ, जुझारूपन और दृढ़ता की कहानी है; लेकिन साथ ही यह अहंकार, पितृसत्तात्मकता और गलतफहमियों की भी कहानी है। मुखर्जी सदियों की खोजों, विफलताओं, जीतों और मौतों का वृत्तांत प्रस्तुत करते हैं, जिसे उन्होंने अपने पूर्ववर्तियों और समकालीनों की नजरों से देखा है। ये सभी एक ऐसे असीम रूप से शक्तिशाली शत्रु के विरुद्ध अपनी बुद्धि-कौशल का प्रयोग कर रहे थे, जिसके बारे में माना जाता था कि 'कैंसर के विरुद्ध युद्ध' छेड़कर उसे हराया जा सकता है।

मुखर्जी का मानना है कि विज्ञान की कहानी केवल खोज की कहानी नहीं है, बल्कि यह असफलता की खोज की कहानी भी है। सर्जरी, रेडिएशन और कीमोथेरेपी करने वाले चिकित्सकों ने कैंसर के मूल तंत्र को समझे बिना ही उसका इलाज करना शुरू कर दिया था। वह इस बात पर जोर देते हैं कि यह विचार कि कैंसर कोशिकाएं हमारी ही प्रतिरूप होती हैं, महज एक रूपक नहीं है। वह कहते हैं, 'हम कैंसर से तभी छुटकारा पा सकते हैं, जब अपनी शारीरिक प्रक्रियाओं से भी छुटकारा पा लें—वे प्रक्रियाएं, जो विकास पर निर्भर करती हैं, जैसे कि बुढ़ापा, पुनर्जनन, घाव भरना और प्रजनन।'
एक दिन पहले

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