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हेमंत देवलेकर: बारिश एक दृष्टिभ्रम है - सिर्फ़ पृथ्वी देख पाती

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एक

वसंत की भाप हैं बादल

बारिश एक दृष्टिभ्रम है–
सिर्फ़ पृथ्वी देख पाती
आसमान से वनस्पतियों का उतरना

बूँदों में कितने भिन्न
और असंख्य बीज
मिट्टी की इच्छा और अनिच्छा से भरपूर
मिट्टी के हर एक कण पर
लहराता है हरा परचम

बारिश कितनी बड़ी तसल्ली है
कि मवेशी अब
किसी दया के मोहताज़ नहीं
स्वाधीनता का उत्सव है बारिश

दो

रिमझिम बारिश हो रही है
जैसे आसमान से झर रहा है आटा
मिट्टी के रोम-रोम :
चींटियों के असंख्य अकुलाए मुँह
घास पर थिर हैं

बारिश के मोती
जैसे नन्ही हथेलियों में
चिरौंजी के दाने

धूप आ गई
पल भर में घास
जगमगाते हीरों की खदान में बदल गई
सूर्य को
करोड़ों परमाणुओं में बाँटने का
करिश्मा है बारिश

नहाया सूर्य
इस वक़्त ठीक सिर के ऊपर है
सोचता हूँ
इंद्रधनुष अभी कहाँ उगा होगा
क्या यह खिली हुई घास
इंद्रधनुष का ही रंग है? 

 

एक दिन पहले

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