ख़र्जी
भ्रमण को निकले
गुज़र रहे थे
जिन रास्तों से हम
उनके आजू-बाजू
झरने थे, पहाड़ थे
और थीं घाटियां भी
ऐसे मनोरम दृश्यों से
गुज़र कर
पहुंचे जब अपनी
मंज़िल तक हम
तो ढलने लगा था
तब सूरज
देखा मैंने जब
अपने जिगरी दोस्त
की आंखों में
तो दिखाई दी वहां
एक काली छाया मुझे
एक ऐसी छाया
जो कभी-कभी
हो जाती है गहरी
उस बादल की तरह
जो चाहता हो फटना
दोस्त की
उन ग़मज़दा आंखों ने
भर दिया उदासी से मुझे
ख़ुशी में मेरी इसने
घोल दी
मानो विष की एक बूंद
देनी है अपने दोस्त को मुझे
अब सांत्वना
ताकि रहे न
वह इस पूरे भ्रमण
के दौरान
अनमना।
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