शाम आते ही तुम आ जाती हो,
जाने किस पगडंडी से मेरे मन में उतर आती हो।
जब दिन की थकी हुई धूप
आँगन के किसी कोने में बैठकर
अपने सुनहरे पंख समेटने लगती है,
जब लौटते हुए पंछियों की कतारें
आकाश पर उदासी की इबारत लिखती हैं,
तब तुम्हारी याद का पहला दीप
मेरे भीतर जल उठता है।
शाम आते ही तुम आ जाती हो।
हवा में घुली रजनीगंधा की महक बनकर,
दूर किसी मंदिर की घंटी की ध्वनि बनकर,
या फिर चुपचाप
मेरी अधूरी कविताओं के बीच
एक शब्द की तरह।
मैं जानता हूँ,
तुम यहाँ नहीं हो,
फिर भी लगता है जैसे
मेरे सामने बैठी हो
और अपनी हँसी से
दिन भर की सारी थकान धो रही हो।
शाम आते ही तुम आ जाती हो।
खिड़की पर टिके हुए चाँद के टुकड़े में,
सड़क पर फैली पीली रोशनी में,
किसी अनजाने गीत की धुन में,
या फिर उस ख़ामोशी में
जो तुम्हारे नाम का उच्चारण करती रहती है।
कभी तुम्हारी आँखें याद आती हैं—
जैसे किसी झील में ठहरा हुआ सावन,
कभी तुम्हारी बातें—
जैसे बारिश के बाद
पत्तों पर ठहरी हुई धूप।
और मैं देर तक
यादों की उस नदी के किनारे बैठा रहता हूँ,
जहाँ हर लहर तुम्हारा चेहरा बनाती है
और हर लहर उसे फिर बहा ले जाती है।
शाम आते ही तुम आ जाती हो।
तुम्हारा आना
किसी चमत्कार जैसा नहीं,
एक आदत जैसा है—
साँसों की तरह,
धड़कनों की तरह,
उस विश्वास की तरह
जो दूरी से कभी नहीं टूटता।
इसलिए हर दिन
मैं शाम का इंतज़ार करता हूँ,
क्योंकि दिन भर दुनिया मेरे साथ रहती है,
पर शाम होते ही
तुम मेरी हो जाती हो।
और तब लगता है—
प्रेम शायद यही है,
कि कोई दूर रहकर भी
हर संध्या तुम्हारे पास लौट आए।
शाम आते ही तुम आ जाती हो,
जाने किस पगडंडी से मेरे मन में उतर आती हो।
- प्रकाश नीरव
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