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जाके पांव ना फटी बिवाई

                
                                                         
                            कहते हैं ना जाके पांव ना फटी बिवाई
                                                                 
                            
वो क्या जानें पीर पराई।

वर्तमान युग में यह बात मुझे अजीब सी लगती
है आज के युग में सबके पांव की बिवाई फट
चुकी हैं मगर पर पीड़ा महसूस करना नहीं चाहते।

पर पीड़ा महसूस करने में उनका नुकसान है।
पर पीड़ा महसूस करने में मदद करनी पड़ती है।
त्याग समर्पण मन शक्ति समय ऊर्जा सब नष्ट
होता है।

इस स्वार्थी युग में भला यह कार्य कौन करना
चाहेगा। लोगों में लेने के भाव है पर पीड़ा समझने
के लिए देना पड़ता है प्रेम तन-मन-धन समर्पित
करना पड़ता है।
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एक दिन पहले

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