समय की धूल में कहीं दब गया है वह,
नक्शों से जो धीरे-धीरे मिट गया है वह।
जहाँ कभी गलियों में खिलखिलाहट होती थी,
आज वहाँ सन्नाटों की गहरी आहें सोती हैं।
मिट्टी के कच्चे घर, अब ढहने को आए हैं,
पेड़ों के साये भी, अब पराये से हो गए हैं।
चौपाल की वह बैठक, अब सूनी पड़ी है,
पीपल की टहनी पर, खामोशी खड़ी है।
किसी ने दरवाजा बंद किया था बरसों पहले,
शहर की चकाचौंध में, खो गए सब संभले।
चौखट पर उगी घास, घर का दर्द सुनाती है,
पवन पुरानी यादों की राख उड़ाती है।
वह कुआँ अब सूख चुका, प्यास उसकी बुझ गई,
गाँव की रूह कहीं, धुंध में ही उलझ गई।
न कोई आता है वहाँ, न कोई खबर लाता है,
बस एक भूला हुआ गाँव, खुद में ही सिमट जाता है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X