लिखना जो चाहा तुझे अल्फाजों में
मेरी जिंदगी की ये सारी किताब भर गई
किस्से लिखता गया तेरी वफ़ा के
न जाने कब ये कायनात बीत गई
गांव से शहर शहर से न जाने
कब ये देश की बात बदल गई
मैं तो था अभी नींद में गहरी
न जाने कब वो सुनहरी रात गुजर गई
खोना नहीं था में चाहता तुम्हे जिंदगी में कही
पर सुबह होते ही मेरी आंख न जाने कैसे बेवफाई कर गई
वाकई ये कोई कहानी नहीं मेरी पूरी जिंदगी की गवाही हैं
मैं ही मुजरिम मैं ही वकील
वो कुछ ही पल मेरी जिंदगी की अदालत में
ज़ज बनकर सजा ए मौत सुना गई
अपनी दलील में मैने जब चुप्पी तोड़ पूछा कसूर मेरा
वो बिन मांगे दी इज्जत और प्यार को गुनाह बता बैठी
मैने भी हंसते हंसते कबूल किया अपना गुनाह
खुश थी वो छोड़ कर मेरा दामन
तो मैं क्यों होता निराश
भंवरा आखिर कब तक करता
एक ही फूल के दोबारा बनने का इंतजार
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