आज रिज़ल्ट
आ सकता है
कौनसा मोड़
कौनसा रस्ता मिलता है
बहुत सी उम्मीदें बांध ली हैं
बेक़रारी में रोज़ जान दी है
मुझे दूसरों की तरक़्क़ी से क्यों जलन होगी?
मुझे, पहले, नांव पर चढ़ा दो...
और किनारे तक नौका हंका दो...
इधर मेरी हस्ती... जलमग्न, हो रही :(
और ख़ुद से
कुछ भी करने की...
बिलकुल भी नहीं बस की!
ना ख्यालों में ताज़गी
ना वो खुशनुमा जहां ही
कैसे तब
मेहनत करने में
रमा रहा... मैं ही?
मुझे क़िस्मत क्यों इतना आज़माती
एक पे एक मसाइल रख रखके जाती
ऐसे में, कोई शौक़ ढूंढना...
लाज़मी नहीं
ऐसे में, किसी को चाहना...
फिर वही गलती?!
तुम कैसे शांत रह आए
तुम्हें कैसे एकांत सुहाए
अकेलापन नहीं उसको माने
रंग और नूर की... क्या वो शर्तें?
-राहुल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X