घर आकर भी घर कहा आता हूँ
सुब्ह की शांत शीतल हवा में
आती हुई खिड़की से टकटकी लगाए नजरे
सूरज से आग्रह थोड़ी और देर कर दे
जिम्मेदारियों में मैनें पलटी नही सफ्हे
सूरज की रोशनी में चाय की चुसकिया तो लूं
शायद ठीक से
बच्चों को जी भर कर देखने न दे
बच्चों की मुस्कान ,
उनसे ठीक से बातें करने न दे
मै जितनी देर काम में जाना चाहता हूँ
उतना ही जल्दी घर आना चाहता हूँ
पर घर आकर भी मैं घर कहा आता हूँ
मैं देखना चाहता हूँ बच्चों की हंसी ,
उसे किस्से सुनाते हुए
सुलाना चाहता हूँ उसे
बांहो में लपेटे हुए
पर ख्वाहिशे ,ख्वाब बन जाता है
पत्नी की आँखों में चमक नही
उनींद में थकी हुई
कहती है खाना लगा है खा लो
शायद स्वप्न देखता हो
मेरे आने का इन्तजार पहले ,और मेरा
इंतजार रह ही जाता है जब मैं घर आता हूँ
पर घर आकर भी मैं घर कहा आता हूँ
दिन बीता रात बीती
कहानी में कही मोड़ नही,सब वैसे ही
बस ये बच्चें अब थोड़े बडे हो गए
अपनी जिम्मेदारी संभाल ली
अब बच्चें अपनी जिम्मेदारी में
घर छोड़कर शहर चले गए अपने काम में
जो समय हमारा था अब वही बच्चों का है
और अब हम उनका इन्तजार करते है
और उनका इन्तज़ार ,इन्तजार ही रह गया
'-रजेन्द्र प्रसाद प्रजापति '
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