वक्त की उँगली थामे हम चलते रहे,
रास्ते खुद-ब-खुद हमसे मिलते रहे।
कभी धूप बनकर हँसी दे गया,
कभी छाँव बनकर हमें ले गया,
ये वक्त भी कितना अजीब हमसफ़र,
कभी साथ आया, कभी दूर हो गया।
पल-पल की चादर यूँ बुनता रहा,
सपनों के धागों को चुनता रहा,
हम सोचते ही रहे कल के बारे में,
और आज चुपके से गुजरता रहा।
कुछ याद बनकर दिलों में बसा,
कुछ रेत-सा हाथों से फिसलता रहा,
हम रोकना भी चाहें तो कैसे उसे,
ये वक्त तो बस यूँ ही चलता रहा।
चलो आज को हम गले से लगा लें,
जो है पास उसे दिल में बसा लें,
कल किसने देखा है इस राह में,
जो पल मिला है उसे मुस्कुरा लें।
वक्त की उँगली थामे हम चलते रहे,
रास्ते खुद-ब-खुद सामने बनते रहे...
-राजेश्वरी जोशी
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