आंधियां चलती होंगी तूफ़ान भी आते होंगे,
बादल गरजते होंगे बिजलियाँ भी डराती होंगी,
इंसान हैं वो आख़िर इंसान की तरह रोते होंगे,
जंग में माँ दुधमुहों को आंचल में कैसे छिपाती होंगी!
बंदूकें चलाते इधर वाले ऊधर वाले भी तानते होंगे,
आग इनके कारतूसों में तो धुआँ उनके भी उड़ाते होंगे,
जिरहबख़्तर के पीछे जिस्म लोहे का कहाँ होता है,
चौड़े सीनों पर संगीनों के वार कभी तो जवान खाते होंगे!
मज़े की बात है के आग लगाने वाले आग से दूर होते हैं,
किन्हीं ज़ाती वजूहातों पर जंग का ज़हरीले बीज बोते हैं,
लड़ते हैं वह जिनका जंग से दूर का भी सरोकार नहीं,
माँ, बहन, बीवी, बाप, बच्चे और भाई बहुत कुछ खोते हैं.
गऐ ज़माने की तरह लड़ाई अहम का टकराव कब होती है,
अब ये बेग़ैरतों, बदकारों, और बदचलनों का हथियार होती है,
पस-ए-परदा खेल क्या चल रहा इनका कोई क्या जाने!
भला पूछिये इन बेशर्मों की भी क्या कोई ज़ात होती है!!
मगर मेरा उम्मीद से किनारा नहीं है,
बिना सफर के गुज़ारा नहीं है,
नावें साहिल पे खड़ी हैं तो क्या,
समंदर का सूख जाना मुझे गवारा नहीं है.
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