उठो यार, अब आँखें खोलो।
आज़ादी है, कुछ तो बोलो।
बीते दिन से लूट मची है।
धर्म के नाम से फूट मची है।
उल्लू चहक रहे पेड़ों पर ।
बिलख रहे सब गाँव नगर।
भारत माता है अकुलाई।
क्या चाहा था क्या छवि पाई।
बही वक्त की उल्टा धारा।
संसद ने है तुम्हें पुकारा।
उठो चलो सबकुछ न खोओ।
सुनो मित्र अब न तुम सोओ।
– रमाकान्त चौधरी
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