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आंखें खोलो

                
                                                         
                            उठो यार, अब आँखें खोलो।
                                                                 
                            
आज़ादी है, कुछ तो बोलो।

बीते दिन से लूट मची है।
धर्म के नाम से फूट मची है।

उल्लू चहक रहे पेड़ों पर ।
बिलख रहे सब गाँव नगर।

भारत माता है अकुलाई।
क्या चाहा था क्या छवि पाई।

बही वक्त की उल्टा धारा।
संसद ने है तुम्हें पुकारा।

उठो चलो सबकुछ न खोओ।
सुनो मित्र अब न तुम सोओ।
– रमाकान्त चौधरी
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
13 मिनट पहले

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