"अहिंसा का आह्वान — क्षमा की पुकार, मानवता का आधार"
आज भगवान महावीर स्वामी की पावन जयंती पर,
मन करता है झुक जाए भीतर का अहंकार,
और हम कहें उस सृष्टि से—
जिसे हमने अपने ही हाथों किया बीमार।
हवा से क्षमा —
हे जीवनदायिनी, तुम्हें हमने जहर बनाया,
स्वार्थ की धुंध में तुम्हारा निर्मल स्वरूप छिपाया।
हर सांस जो तुमने दी, हमने उसे दूषित किया,
अपने ही अस्तित्व को धीरे-धीरे संकट में डाला।
पेड़ों से क्षमा —
हे छाया के दाता, हमने तुम्हें काट डाला,
हरियाली के बदले कंक्रीट का अंधकार पाला।
तुम्हारी शाखाओं पर था जीवन का संगीत,
हमने उसे तोड़कर बना लिया विकास का झूठा गीत।
पक्षियों से क्षमा —
तुम्हारे गीतों से सजती थी यह सुबह-सुहानी,
हमने छीनी तुमसे तुम्हारी हर कहानी।
घोंसले उजड़े, आकाश भी अब सीमित हुआ,
मानव का विस्तार, प्रकृति का विनाश बन गया।
जल से क्षमा —
हे अमृत, तुम्हें हमने अपवित्र किया,
नदियों में जहर घोल, जीवन का ही अपमान किया।
तुम्हारे बिना एक पल भी संभव नहीं अस्तित्व,
फिर भी तुम्हें ही हमने सबसे अधिक किया भ्रष्ट।
मिट्टी से क्षमा —
हे धरा, तुम्हारे आँचल में जीवन पनपता है,
पर हमने तुम्हें पत्थरों में बदल दिया।
कंक्रीट के जंगल उगाकर,
प्रकृति का हर स्पंदन कुचल दिया।
पर क्या केवल प्रकृति से ही हिंसा होती है?
नहीं, यह तो बस एक आयाम है—
असली हिंसा तो छिपी है
हमारी वाणी, हमारी सोच, हमारे व्यवहार में हर शाम है।
भगवान महावीर स्वामी ने कहा—
“अहिंसा केवल कर्म से नहीं, विचार और वाणी से भी होती है,”
पर हमने शब्दों को हथियार बना लिया,
और रिश्तों को ही रणभूमि बना दिया।
घर में बोले गए कठोर शब्द,
बन जाते हैं दिलों के घाव,
जहाँ प्रेम होना था,
वहाँ अहंकार करता है अपना प्रभाव।
बच्चों की कोमल दुनिया में
जब गूंजती है डांट की आवाज,
तो उनका आत्मविश्वास टूटता है,
और जन्म लेता है एक मौन अंदाज़।
सड़कों पर गुस्सा,
एक छोटी सी बात को बना देता है युद्ध,
जहाँ संयम चाहिए था,
वहाँ हम चुन लेते हैं क्रोध का वृत।
कार्यस्थल पर अपमान की आग,
कर्मठता को राख बना देती है,
जहाँ सम्मान होना चाहिए,
वहाँ भय ही संस्कृति बन जाती है।
समाज में भी शब्दों की तलवार,
रिश्तों को चीर देती है,
अफवाह और घृणा की आँधी
विश्वास की नींव हिला देती है।
पर इतिहास गवाह है—
जहाँ अहिंसा है, वहीं सृजन है,
वहीं शिक्षा, वहीं खुशी, वहीं नवोन्मेष का वंदन है।
कोस्टा रीका ने जब हथियार छोड़े,
तो शिक्षा और सुख का मार्ग अपनाया,
आज खुशहाली की सूची में
उसने ऊँचा स्थान पाया।
जापान ने जब हिंसा से दूरी बनाई,
तो विकास की गति ने नया इतिहास रचाया,
शांतिपूर्ण संकल्प ने
उसे विश्व की शक्ति बनाया।
भारत ने भी अहिंसा का दीप जलाया,
भगवान बुद्ध और महात्मा गांधी का मार्ग अपनाया,
बिना युद्ध के स्वतंत्रता पाई,
और दुनिया को प्रेम का पाठ पढ़ाया।
स्विट्जरलैंड ने शांति को अपनी पहचान बनाया,
नवाचार को ही अपनी शक्ति बनाया,
युद्ध से दूर रहकर भी
उसने विश्व में सम्मान कमाया।
फिलीपींस ने बिना हथियार के क्रांति की,
अहिंसा से ही सत्ता बदली,
आज सेवा और उद्योग में
उसने नई ऊँचाई गढ़ी।
तो फिर क्यों हम आज भी
हिंसा को आसान समझ लेते हैं?
क्यों शब्दों के तीर चलाकर
अपने ही संबंधों को तोड़ देते हैं?
सच यह है—
हिंसा आदत है, सहज है, त्वरित है,
पर अहिंसा साधना है, साहस है, और चरित्र की श्रेष्ठता है।
आइए, इस महावीर जयंती पर
हम केवल पूजा न करें,
बल्कि अपने भीतर के क्रोध, अहंकार और कठोरता को दूर करें।
हर शब्द में मधुरता हो,
हर विचार में करुणा हो,
हर कर्म में संवेदना हो—
यही सच्ची अहिंसा हो।
आज एक संकल्प लें—
न किसी को चोट पहुंचाएंगे,
न शब्दों से, न विचारों से,
हम मानवता का दीप जलाएंगे।
क्योंकि जब दुनिया हथियारों की भाषा बोल रही है,
तब अहिंसा ही है जो आशा का गीत सुनाती है,
और यही मार्ग हमें
सच्चे विकास और शांति की ओर ले जाती
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