अनदेखी यात्राएँचलो वहाँ, जहाँ प्रश्न अभी भी जीवित हैं,
जहाँ उत्तरों से पहले
जिज्ञासाएँ जन्म लेती हैं।
जहाँ मृत्यु,
अंत नहीं,
एक अनकहा विराम बनकर
जीवन के कानों में कुछ फुसफुसाती है।
हमने माप लिए हैं
समुद्रों के तल,
आकाशगंगाओं के विस्तार,
पर आज भी
अपने ही मन की गहराइयों में
एक दीपक लेकर उतरने का साहस
बहुत कम लोगों ने किया है।
विज्ञान कहता है—
"प्रमाण लाओ।"
आस्था कहती है—
"अनुभव करो।"
और सत्य मुस्कराकर कहता है—
"पहले स्वयं को पहचानो।"
कौन जानता है
कितनी यात्राएँ
हमारी आँखों से नहीं,
हमारी चेतना से होकर गुजरती हैं।
कितनी बार हम जन्म लेते हैं
अपने ही भीतर,
और कितनी बार
अपने ही अहंकार की राख से
फिर उठ खड़े होते हैं।
शायद पुनर्जन्म
केवल शरीर का नहीं होता,
हर क्षमा में
एक नया जन्म छिपा होता है।
हर करुणा
एक नया जीवन लिखती है।
हर सत्य
मनुष्य को
उसके पुराने स्वरूप से मुक्त कर देता है।
मृत्यु यदि आए भी,
तो वह केवल इतना पाए
कि इस जीवन में
हमने प्रेम को बचाए रखा,
विश्वास को थामे रखा,
और मनुष्य होने की गरिमा
किसी कीमत पर नहीं बेची।
क्योंकि
सबसे लंबी यात्रा
धरती से आकाश तक नहीं,
स्वार्थ से सेवा तक है।
सबसे ऊँची उड़ान
पंखों की नहीं,
विवेक की होती है।
और सबसे उजला प्रकाश
सूर्य का नहीं,
जागृत अंतःकरण का होता है।
यदि कोई पूछे—
जीवन का सबसे बड़ा रहस्य क्या है?
तो मुस्कराकर कहना—
रहस्य मृत्यु नहीं,
रहस्य यह है
कि सीमित समय में भी
मनुष्य
असीम प्रेम करना कैसे सीख लेता है।
चलो,
अनदेखी यात्राओं पर निकलें—
जहाँ हर प्रश्न
एक दीपक है,
हर अनुभव
एक तीर्थ है,
और हर धड़कन
यह याद दिलाती है कि
जीवन की सबसे सुंदर मंज़िल
बाहर कहीं नहीं,
अपने भीतर है।
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