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इजाज़त

                
                                                         
                            इजाज़त माँग बैठे हम ख़ुद से,
                                                                 
                            
कि अब न रुकेंगे ये बढ़ते क़दम,
चाहे राह में कैसी भी बाधाएँ हों,
न होगा कभी हौसला कम।

ये मुस्कुराते होंठ यूँ ही रहें,
मुस्कान को कम न होने देंगे,
दुःख की धूप भले ही आए,
मन का उजियारा न खोने देंगे।

चलेंगे अपनी राह निरंतर,
अपने विश्वास का दीप जलाकर,
हर अँधेरे से कह देंगे हम,
रास्ता अपना है, मुस्कुराकर।

जीवन ने जो सीख दी है,
उसे संबल बनाकर चलना है,
गिरकर फिर उठ जाना है,
हर पल ख़ुद को गढ़ना है।

इजाज़त अब मिल चुकी है,
सपनों को पंख लगाने की,
सत्य, साहस और मुस्कान संग,
अपनी मंज़िल तक जाने की।

न शिकायतों का बोझ रखेंगे,
न परिस्थितियों से हारेंगे,
अपने भीतर के विश्वास के संग,
हर दिन नया संसार रचेंगे।

जब मन ने "हाँ" कह दी,
तब मंज़िल ने भी बाँहें खोल दीं।
आज ख़ुद से इजाज़त मिली है,
अब उड़ान का समय है।
- रामकुमारी कर्नाहके
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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