मेरे मरने की खबर उस तक कुछ इस तरह पहुँचे,
कि जैसे दर्द में लिपटी कोई सदा पहुँचे।
मेरे जनाज़े को उसकी गली से ले जाना,
कि दम-ए-आखीर उसे मेरी इल्तिजा पहुँचे।
ज़रा सा रोक देना कदम उस मकाम पर यारो,
जहाँ से रूह को यादों की कुछ हवा पहुँचे।
वो देखे या न देखे, पर मेरा गुजरना हो,
कि मर के ही सही, मुसाफिर खुदा पहुँचे।
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