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माटी और मान

                
                                                         
                            खेतों-खलिहानों में चलता हूँ, पैर तो मैले होंगे,
                                                                 
                            
रेशमी जूतों से पाँव के छाले कम नहीं होंगे।

कच्ची पगडंडी ही ले जाएगी घर तक मेरे,
नगर की इन सड़कों से फासले कम नहीं होंगे।

तपकर जो सूरज में निखरा है रूप मेरा,
छाँव के घेरों में ये उजाले कम नहीं होंगे।

तू रख ले अपनी ये राजसी सुख-सुविधाएं,
सादगी के इस जीवन में हौसले कम नहीं होंगे।
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एक घंटा पहले

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