कुछ कहूं क्या ....
यूं न रहूं लबों से खामोश
कुछ कहूं क्या।
मुखड़े पे उदासी न रहे तुम्हारे
आ जाये मुस्कुराहट
कुछ ऐसी बात करूं क्या।
बहारों को रोक लूं गुंचाये बागों में
नजारों को आंखों में भर दूं
कहो तो फूलों को आगवानी
को कहूं क्या।
हाथ थाम लूं तुम्हारा हाथों में अपने
और बस आंखों से
बात करूं क्या।
यूं न रहो अंधेरों में जरा चरागों को रौशन कर लो
कहो तो जुगनुओं को कैद करूं क्या।
कह दो इत्ममिनान से दिल में गमगीन बातें सभी
में पलकों में छिपा लूं
कहो तो चांद को गवाही में
रखूं क्या।
-रजनी पांडेय
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