सब बेउम्मीदों पर उतर रहे,
किससे उम्मीद लगाई जाए।
जब ठहरा पानी नदियों का,
तालाबों से क्या निकला जाए।
दर्द बयां किससे कर दें,
सब एक जहर ही खाएं हैं।
तुम हमसे कह दो हम तुमसे कह दें,
बस इससे मन को बहलाया जाए।
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