प्रेम जीवन का,एक अनमोल तौफा है।
प्रेम में जीना और,प्रेम में मरना है।
प्रेम की परिभाषा को,विश्लेषण करना कठिन है।
प्रेम हृदय से निकलने वाली,मीठी भाव है।
प्रेम चाहत ही नही ,आत्मा की आवाज है।
प्रेम रस है आनन्द और,सुकून का पल है।
प्रेम खुसी है, उल्लास है, ह्रदय की आवाज है।
प्रेम दर्द की दवा होती है, खुदा की दुवा होती है।
प्रेम रोते को हसा सकता है, जीवन को महका सकता है।
प्रेम ओ कम्पन है, जिसे अहसास किया जा सकता है।
प्रेम के बिना,ये जीवन शून्य सा लगता है।
प्रेम जीवन मे,जीने का राह दिखता है।
प्रेम विरह वेदना का,पाठ पढ़ता है।
प्रेम व रस है, जो जीवन मे आनन्द लाता है।
प्रेम क्या?है सिर्फ चाहत ही प्रेम नही होता।
प्रेम दिल से निकली,मीठी मुस्कान होता है।
जब दो दिल मिलता है, तो हृदय में कम्पन होता है।
दोनों हृदय मन की,भाव को समझता है।
एक दूसरे के बिना,अकेला महसूस होता है।
ना रहे पास तो ,जीवन शून्य लगता है।
प्रेम हृदय की ओ मीठी तान है, जो सुकून देता है।
प्रेम गीत है संगीत है, ठंडी हवाओ का झौका है।
प्रेम झील है, नदिया है, सागर की गहराई है।
प्रेम अनन्त है, हर प्रेम में आनन्द समाई है।
प्रेम मन की हरियाली है, सुखी रहने का साधन है।
प्रेम आँखों से हो कर ,दिल तक उतरता है।
प्रेम ओठो से हो कर हृदय को छूता है।
प्रेम कभी बसन्त और,कभी बहार बन जाता है।
प्रेम कभी दिल मे,सावन का फुहार बन जाता है।
प्रेम कभी दिल को भिगोने वाली,बरसात बन जाता है।
प्रेम कभी सुकून देने वाली,रिमझिम फुहार बन जाता है।
प्रेम मोगरे और कभी,गुलाब बन जाता है।
प्रेम अक्सर धुप में,आनन्द भरे छांव बन जाता है।
प्रेम हर जीवन की,सांसे और प्राण बन जाता है।
प्रेम महकती चम्पा,चमेली और गुलाब बन जाता है।
निश्छल प्रेम,हृदय में सदा ही स्थाई रह जाता है।
ना मिले निश्छल प्रेम,तो दिल मे स्मृति बन जाता है।
दूर रहे निश्छल प्रेम तो,
इंतिजार बन जाता है।
पास ना रहे निश्छल प्रेम तो,यादे बन जाता है।
साथ चले निश्छल प्रेम तो,सच्ची साथी बन जाता है।
साथ रहे निश्छल प्रेम तो,हम सफर बन जाता है।
बन्ध में बन्ध जाए तो, अर्धाग्नि जाता है।
साजन के साथ निभये तो,सजनी बन जाता है।
प्रेम का बन्धन अनमोल होता है, कोई मोल लगा नही सकता।
निश्छल प्रेम को इस जग में, कोई मिटा नही सकता।
प्रेम सच्चा हो तो,जीवन शुखमय बन जाता है।
सच्चे प्रेम के बिना,ये जीवन सुना लगता है।
प्रेम हर किसी से नही होता,मगर सच्चा प्रेम एक बार जरूर होता है।
सच्चा प्रेम किसी से हो,ओ सदा हृदय में रहता है।
साथ ना भी रहे,तो यादे और स्मृति बन कर रहता है।
सच्चा प्रेम जीवन मे एक बार जरूर होता है।
जिसे कोई ,भुलाया नही जा सकता है।
प्रेम किसी से हो,मगर प्रेम निश्छल होना चाहिए।
एक दूसरे के हृदय में,दोनों को रहना चाहिए।
झूठी प्रेम कभी भी,दिल मे स्थाई नही रह सकता।
झूठी प्रेम कभी भी,हृदय को सुकून नही दे सकता।
छल कपट से किया प्रेम,अक्सर मिट जाया करते हैं।
निश्छल प्रेम सदा-सदा,हृदय में ही रहते हैं।
प्रेम की परिभाषा अनन्त है, विश्लेषण करना कठिन है।
बस प्रेम निश्छल हो, सच्चा हो सायद वही जीवन है।
प्रेम की परिभाषा अनन्त है, विश्लेषण करना कठिन है।
जो प्रेम हृदय के भाव को समझे,सायद वही सच्चा प्रेम है।
जीवन मे साथ दे,दुख दर्द का अहसास हो
सुख दुख में साथ हो,संग चल वादा निभाता हो।
सायद वही सच्चा और,निश्छल प्रेम है।
प्रेम की परिभाषा अनन्त है, विश्लेषण करना कठिन है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X