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ख़ामोशी को आज़माया न जाए

                
                                                         
                            हमसे यूँ हर बार रिश्ता बनाया न जाए,
                                                                 
                            
फिर उसी रिश्ते को पल भर में गिराया न जाए।

दिल के जज़्बात को यूँ खेल समझने वालों,
हमको हर मोड़ पे यूँ आजमाया न जाए।

हमने सीखा है अंधेरों में भी जलते रहना,
हमसे रोशनी का सच यूँ छिपाया न जाए।

जो भी कहना हो खुली बात में कह दो आकर,
पीठ पीछे कोई किस्सा यूँ सुनाया न जाए।

हम तो सच बोल के अक्सर ही खड़े रहते हैं,
हमसे झूठों का ये रिश्ता यूँ निभाया न जाए।

हमने देखा है बदलते हुए चेहरों का जहाँ,
अब किसी शख़्स पे यूँ दिल को लगाया न जाए।

हम अकेले ही बहुत हैं इस ज़माने के लिए,
हमको भीड़ का तमाशा यूँ दिखाया न जाए।

अंतिम शेर:
अपनी शर्तों पे ही जीता है ये दिल “सचिन”,
इसको हालात के आगे यूँ झुकाया न जाए।
-सचिन प्रजापति
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2 घंटे पहले

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