क्या जिंदगी मेरी ,है मुझसे चाहे,
नहीं समझ में कुछ आ रहा है,,
बहुत अजीब सा ,है हो रहा मन,
धड़कन जैसे कोई वापस बुला रहा है।।
क्या चाहता है , भाग्य मेरा,
खड़ी निशा क्यों बुला रही है,
तकलीफ में क्यों चुभन नहीं है,
क्या बात हमसे छुपा रही है,,
उदासी का है पसरा आलम,
बुरा ख्याल क्यों डरा रहा है।।
चमक नहीं है ,क्यों आज नभ में,
तारे जब की टिमटिमा रहे हैं,,
फिज़ा हुई, है जा रही ठंडी,
फिर भी क्यों नहीं गला रही है,,
क्या हो रहा है आज इस क्षण,
कौन सा डर सता रहा है।।
बेचैनियों की ओढ़े चादर,
डरा रहे क्यों, ये काले बादल,
क्या कहना चाहे , नियति हमारी,
क्या गुल खिलाएगा मेरा कल,
संकेतों की भाषा में क्या विधाता,
हमको आखिर बता रहा है।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X