अगर सिकवा शिकायत ही नहीं तो क्या मोहब्बत है।।
सभी गर आँख में आ जाए तो फिर क्या अलामत है।।
रहे इतना करम साक़ी के बस अब पैमाने लबालब हो,,
अगर मय चढ़कर उतर जाए तो फिर क्या शरारत है।।
कली कमसिन किसी गुल की गुलाबी सुर्ख़ या पीली,,
अगर हम होश में आ जाए तो फिर क्या नज़ाकत है।।
नफ़ा नुकसान वो सोचे जिसे सौदा करना नहीं आता,,
अगर कुछ भी ना कमा पाए तो फिर क्या तिजारत है।।
दिन में तारें गिनता है और शब भर करवट बदलता है,,
अगर कुछ बेचैनी ही ना हो तो फिर क्या मोहब्बत है।।
मुझसे दूर ना होना कभी ऋतु आती जाती रहना बस,,
अगर कोई हाल ना पूछेगा तो फिर क्या रफ़ाक़त है।।
मुझे वहाँ दफ़्न करना बस जहाँ तेरे कदम पड़े ये देव,,
अगर तेरी खुशबू नहीं आयी तो फिर क्या वजाहत है।।
-सुनील देव
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