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रहा भी तो नहीं।

                
                                                         
                            क्या लिखूँ कैसे लिखूँ कोई रहा भी तो नहीं।।
                                                                 
                            
ज़िंदगी तू ही बता के कुछ बचा भी तो नहीं।।

ये रास्ते ये दूरियाँ ये मोहब्बतों की शब चाँदनी,,
क्या देख लूँ छुपाऊं कोई ख़ला भी तो हैं नहीं।।

अब आँख में बस अश्क़ है बुतकदा की जगह,,
सारे जहां में दूसरा तुझ सा यहाँ भी तो नहीं।।

हज़ार ज़ख्म खाके तेरे आए जो क़ब्रगाह में,,
मिट्टी भी बस रो पड़ी कुछ कहा भी तो नहीं।।

सदमे में ही रहा मेरा चारासाज़ भी बस उम्रभर,,
कहता रहा के तेरे लिए कोई दवा भी तो नहीं।।

मेरी वज़ह से कोई भी आँखों को मैला ना करें,,
ये तो होना ही था मेरा कोई गवाह भी तो नहीं।।

तेरा ग़म मुझे देख कर मुस्कराता रहता है देव,,
चल यूँ ही सही तू मुझे वैसे मिला भी तो नहीं।।
-सुनील देव
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44 मिनट पहले

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