बचपन बीता गांव में
बीती जवानी शहरों में,
ढूंढ रहे ठिकाना अपना
मिला न घर इन उजियारों में।
सफ़र लम्बा है कठिन राहों में
जाएं कहां इन अंधियारों में,
घूम रही जवानी अपनी
यहां-वहां इन गलियारों में।
दूर खड़ा देखा मैंने
आसमान के तारों में,
टूट के बिछड़ा जब इक तारा
वह भी गिरा इन कांटों में।
सफ़र एक सा दोनों का
दोनों तन्हा इन राहों में,
निकल पड़े दोनों साथ मिलकर,
नयी मंजिल की तलाश में।
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