विरह की अग्नि में जलती हूं
बिन पानी मछली जैसी तड़पती हूं,
सांसें तो चलती हैं मेरी भी
पर तेरे बिन पल-पल मरती हूं।
इन्तज़ार में बैठी रहूं मैं
तेरी राह तकती रहती हूं,
तू आएगा कब मेरे पास
हर पल सोचती रहती हूं।
दिन बिताए साथ हमने जो
उन दिनों को याद करती हूं,
आंख भर आएं ग़र मेरी तो
हंसकर खुद को रोक लेती हूं।
तुझसे बात जब नहीं होती
अकेले में गुनगुनाती हूं,
तेरी कही पुरानी बातों को
खुद से ही दोहराती हूं।
विरह की अग्नि में जलती हूं
बिन पानी मछली जैसी तड़पती हूं.!
-संजय बोरा
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