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अपना बक्सर

                
                                                         
                            गंगा की गोद में जन्मी वह पावन धरती,
                                                                 
                            
जहाँ ऋषियों की तपस्या ने पाई अमर कीर्ति।
कदम-कदम पर इतिहास साँसें भरता है,
वह पुण्यभूमि—बक्सर कहलाता है।
यहीं महर्षि विश्वामित्र ने तप का दीप जलाया,
यहीं राम-लक्ष्मण ने शस्त्र विद्या सीखी,
धर्म की रक्षा की दिशा यहीं से दीखी।
रामरेखा की मर्यादा आज भी बोलती है,
कण-कण में आदर्शों की ज्योति घोलती है।
जहाँ आस्था सीमा बनकर खड़ी रही,
और असत्य से सत्य की जंग लड़ी।
फिर समय ने बदली अपनी चाल,
रणभूमि बनी यह शांत-सी ढाल।
1764 का वह ऐतिहासिक क्षण आया,
बक्सर युद्ध ने भारत के भाग्य को मोड़ा,
मीर कासिम, शुजा-उद-दौला, शाह आलम साथ,
अंग्रेज़ों से टकराया स्वाभिमान का हाथ।
पर हार ने लिखी गुलामी की इबारत,
और ईस्ट इंडिया कंपनी ने थामी हुकूमत।
फिर भी झुका नहीं इस मिट्टी का मान,
संघर्ष में भी जीवित रहा स्वाभिमान।
ऋषियों की साधना, वीरों की बलि,
इन्हीं से बनी बक्सर की हर गली।
आस्था जहाँ इतिहास से हाथ मिलाती है,
जहाँ बीता कल आज को राह दिखाती है।
वह केवल नगर नहीं, एक चेतना है बक्सर,
भारत की आत्मा का दर्पण है बक्सर।
-संजय श्रीवास्तव
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18 घंटे पहले

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