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अपनों से दूर- गैरों के बीच

                
                                                         
                            अपनों से दूर, गैरों के बीच
                                                                 
                            
जब अपनापन तलाशने निकलते हैं,
तब अक्सर दिल के रिश्ते नहीं,
सिर्फ़ पेशेवर संबंध ही मिलते हैं।
जहाँ मुस्कानें होती हैं मगर एहसास नहीं,
बातें होती हैं मगर विश्वास नहीं,
हर संबंध किसी प्रयोजन से बंधा होता है,
वहाँ निस्वार्थ स्नेह का वास नहीं।
अपनों की कमी तो पूरी हो जाती है शायद,
पर आत्मीयता का रिक्त स्थान नहीं भरता,
गैरों के बीच मिला अपनापन अक्सर,
दिल से नहीं, परिस्थितियों से उपजता।
-संजय श्रीवास्तव
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