आरा केवल एक नगर नहीं,
यह इतिहास की जीवित गाथा है,
जहाँ हर कण में स्वाभिमान बसा,
हर सांस में आज़ादी की भाषा है।
भोजपुर की इस पावन धरती ने
वीरों को जन्म दिया है,
कुँवर सिंह की तलवार ने
अंग्रेज़ी हुकूमत को चुनौती दी है।
अस्सी की उम्र में भी जो झुका नहीं,
जिसने हार को स्वीकारा नहीं,
उस शेर-ए-बिहार की गूंज आज भी
आरा की हवाओं में उतरी है कहीं।
यहाँ की बोली में अपनापन है,
गीतों में मिट्टी की खुशबू है,
संस्कृति, संस्कार और संघर्ष का
हर पल यहाँ अद्भुत रूप है।
गंगा की धारा से पावन हुआ,
ज्ञान की लौ से रोशन हुआ,
शिक्षा, साहित्य और चेतना ने
आरा को पहचान दी, मान दिया।
क्रांति का केंद्र, विचारों की धरती,
भोजपुर की शान, बिहार की शक्ति,
आरा ने हर युग में यह बताया—
स्वाभिमान से बड़ा कोई धन नहीं होता।
आज भी जब इतिहास पलटते हैं हम,
आरा का नाम चमक उठता है,
क्योंकि यह नगर नहीं,
यह भारत की आत्मा का प्रतिबिंब बन जाता है...!!
-संजय श्रीवास्तव
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