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न जाने कैसे जी गई ।।

                
                                                         
                            चाहती हूं मैं भी सीखना,
                                                                 
                            
प्रेम शब्द की परिभाषा।
वह तो कदापि प्रेम नहीं,
जिसमें छिपी हो कोई आशा।।
निश्छल निर्मल होता प्रेम,
पर स्वार्थ को हम पूज रहे।
प्रेम शब्द को ना पहचाने,
बस वासनाओं से जूझ रहे।।
प्रेम शब्द वह शब्द नहीं,
जिसको हम जान सके।
है इसका कोई गहरा अर्थ,
जिसको ना कभी पहचान सके
सुंदर तन को देख मन में,
भ्रम होता है प्रेम नहीं ।
जो तन का सौदा तन से कर ले,
वो कुकर्म होता है प्रेम नहीं।।
हृदय की हृदय में रखना तुम,
प्रेम प्रदर्शन का खिलौना नहीं।
प्रेम दीवाने खुद समझेंगे,
तुम नैनो से कभी रोना नहीं।।
मिले हमें कोई सच्चा प्रेमी,
इतने अच्छे हमारे कर्म नहीं।
कान्हा सा सच्चा प्रेमी नहीं,
सत्य से बड़ा कोई धर्म नहीं।।
प्रेम किया था मीरा ने,
विष का प्याला पी गई।।
इस कलयुग में वो प्रेमदिवानी,
न जाने कैसे जी गई ।।
 
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2 घंटे पहले

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