क़िस्मत ने गर मिला दिया, इक दिन मिल जाएंगे,
टूटे हुए तमाम ख़्वाब हक़ीक़त में बदल जाएंगे।
फिर पलट कर आएगा इक दिन मौसम-ए-बहार,
दिल के वीरान पड़े गुलशन में फूल खिल जाएंगे।
गुम रहा करते हम जिसके तसव्वुर में दिन-रात,
ख़ुद आकर के वो मेरा दर-ए-दिल खटखटाएंगें।
बीते ज़माने की रिफ़ाक़त हो जाएगी ताज़ा-दम,
तराने उस मोहब्बत के शब-ए-वस्ल गुनगुनाएंगे।
रौशन होगी महफ़िल मेरे साथ उनकी आमद से,
मारे हसद के मेरे रक़ीबों के कलेजे हिल जाएंगे।
- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
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