ज़िंदगी की धूप भी हमारी है छाँव भी हमारी है,
हर चीज़ में दोनों की बराबर की हिस्से-दारी है।
हर मौसम में है गुलज़ार हमारे दिल का चमन,
आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहाराँ मुसलसल जारी है।
हमने मिल के बसाई है ये बस्ती मोहब्बत की,
इसकी सर-ज़मीं कुछ मेरी है कुछ तुम्हारी है।
त'अल्लुक़ात ता-उम्र दिलकश बनाए रखना,
मेरी तुम्हारी दोनों की एक साझा ज़िम्मेदारी है।
शिद्दत इश्क़ की बर-क़रार रहती हर हाल में,
मोहब्बत पे दोनों की बराबर की दावेदारी है।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
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