घोंसला छोड़ पंछी जब निकलती है,
छूने को आसमान पंख जब फैलाती है,
भय से दूर विश्वास को बांधे,
लड़खड़ाना भी आसमान को सिखाती है।
धीरज उसका वेग को चीर,
बादल को भी सुखाता है,
गीली पंखे जब सिकुड़ जाते,
तो हवा पुनः उसे अपनी गोद दे आता है,
कमरे में वो पंछी याद आती है,
क्या मेरी तरह वो भी घबराती है?
कुटुम्ब से दूर है हम दोनो,
क्या छत को मेरे वो भी रुलाती है?
वो भी तो थकती होगी,
आंखें झिलमिल होती होगी,
मेरी तरह व्याकुल मन थामे,
वो भी एक प्रण खातिर कई प्रण तोड़ती होगी।
-शालू सिंह
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