“हितं मनोहारी च दुर्लभं वचः””
मन की बात मुखर होकर,
जब मंच के माईक से गूँजती है।
देशभक्ति की नई-नई परिभाषाएँ ढूंढती हैं।।
कहा “पैदल चलो, ईंधन बचाओ,
साईकल से चल स्वास्थ्य बढ़ाओ,
रेल-बस पकड़ो, और राष्ट्र गढ़ाओ।”
अंधभक्तों ने सोचा—
बात में सचमुच दम है,
त्याग और तपस्या ही तो
जीवन का परम धर्म है।
पर पीछे देखा तो—
सायरनों की आवाज़
और ऊँची चढ़ रही थी,
धूल उड़ाती गाड़ियों की कतार
सड़क नापती बढ़ रही थी।
चमचों के चेहरे हरे-भरे थे,
हाथ हिलाकर, मुस्कान बिखेरते
युगपुरुष खुले रथनुमा कार के
दरवाज़े पर खड़े थे।
और कार के दोनों ओर,
लाल कालीन बिछे पड़े थे,
काली वर्दी वाले प्रहरी
दौड़-दौड़कर हाँफ रहे थे।
बैरिकेड के पीछे
जबरन जुटाया गया भीड़तंत्र,
सरकारी खर्च पर खरीदे फूलों से
चला रहा था पुष्प-वृष्टि का यंत्र।।
इस प्रचंड गर्मी में भी,
सड़क की लंबाई नापते,
चेहरे पर मुखौटा लगा कर
नारे लगाते, हाथ उठाते ये लोग..
मानो यहां लोकतंत्र नहीं,
राजा का दृश्य-उत्सव हो रहा
सच, प्रजातंत्र भीड़ में कहीं खो रहा!
फिर मुरेठा सजाते हुए-
“कोविड वाली थाली फिर से बजाओ!
न कहीं आओ, न कहीं जाओ,
विद्यालय जाने की क्या ज़रूरत?
ऑनलाइन कक्षाएँ लगाओ।
वर्क फ्रॉम होम से ही
सारे धंधे चलाओ।”
आगे कहा-
“विदेशी खर्चों पर लगाम लगाओ,
एक वर्ष देश में रहकर
डॉलर बचाओ।”
भक्तों ने तो पासपोर्ट
अलमारी में धर दिया,
पर भगवान के विमान ने
फिर रनवे भर लिया।
फिर आकाशवाणी आई-
“सोना मत खरीदो भाई,
देशहित में बजने दो
सादगी की शहनाई।”
सुनार के दुकान पर ताला लटकओ।
गहना गढने वालो, झाल मूढी खाओ।।
तभी एक बुजुर्ग ने
मुस्कुराकर कुछ बोल सुनाए-
“उपदेश वही जग को भाए”
जो पहले खुद पर तोला जाए,
जो पैदल चलकर राह दिखाए,
जो कम बोले, करके बतलाए।
जिसकी कथनी-करनी
एक ही राह पर जाए,
वही श्रेष्ठ पुरुष
जग में सम्मान पाए।”
पर उपदेस कुशल बहुतेरे।
जे आचरहिं ते नर न घनेरे॥
कथनी करनी में
जिनके अंतर नहीं होती।
रामभक्ति उसी की सच्ची—
और चरित्र राममय होती।।
“हितं मनोहारी च दुर्लभं वचः”
-शम्भु प्रसाद
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