मंचों पर चरित्र के किस्से,
भाषण में आदर्शों की धार।
और सजाए चंदन लिलार।
मुख से निकले “मंत्रों की लय”,
जेब में नोटों की गड्डी!
बोलते “भारत माता की जय”,
तौलते “सौदों की मंडी”!!
आज लगभग हर नेता के पास
एक नहीं, कई-कई पट्टे हैं।
प्रातः धर्म वाला,
दोपहर संविधान वाला,
बाकी रही, राजनीति वाला।।
“धर्म को बचाओ”,
हिन्दुत्व खतरे में है।
बाबा साहब को जगाओ,
“संविधान भी खतरे में है!
जनता तो बिक रही पाव के भाव,
और गिद्धों की नजर कुर्सी पर है।।
एक तरफ,ऊंचे प्राचीर से,
देशभक्ति के फूल बरस रहे।
दूसरी ओर, केचुल छोड़-छोड़,
मौकापरस्त और लोभी खड़े।।
पक्ष में रहोगे, चरित्र निर्माण होगा,
साथ में सुविधाओं का भी सम्मान होगा।
सच अगर कहोगे तो मुश्किलों का दौर होगा,
मौन अगर रहोगे तो हर तरफ गुणगान होगा।।
सिर झुकाए धर्म खड़ा,
न्याय भी कहीं मौन पड़ा।
संविधान पूछें, मुझे पढ़ा..?
या यूं ही लाईब्रेरी में धरा !
चौक, चौराहे, वोटर सारे,
मिलकर कहते यही जन।
पट्टे बदले, दल भी बदले,
पर भीतर न बदला मन।।
नीट-प्रश्नपत्र लाख में बिकता,
साख नित्य एन-टी-ए की गिरती।
प्रतिभा का विश्वास बिखरता,
सत्ता फिर भी चुपचाप दिखती।।
दोषी कौन, कहाँ, किस ओर?
व्यवस्था का यही मूल्य दिखेगा।
किताबें झूठी या परीक्षार्था कमजोर?
यही प्रश्न-पत्र इतिहास लिखेगा।।
-शम्भु प्रसाद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X